बीत गए वर्ष दो उन्हें दिए हुए पुस्तक
जाने क्यों मौन हैं वो अभी तक समीक्षक
कितनी टीस देती है ये पुस्तक समीक्षा
कैसे ले रहे हैं ये कवि की परीक्षा
दंभ से भरे हुए ये महोदय समीक्ष
नई पौध के हैं ये रक्षक या कि भक्षक
धारा, विद्या विषय नहीं है इन्हें सरोकार
ऐसे समीक्षकों को है बार-बार धिक्कार ।
- गोपाल प्रसाद
गुरुवार, 23 जुलाई 2009
रंगहीन दर्द
भूख से तड़पते व्यक्ति का दर्द
बिन ब्याही बेटी के माँ का दर्द
नशे में धुत पति के व्यवहार का दर्द
शराबी बेटे के हरकतों का दर्द
अपनी संपत्ति खो जाने का दर्द
बीमारी से उत्पन्न कष्ट का दर्द
प्रसव वेदना से तड़पती माँ का दर्द
अपनों के खो जाने का दर्द
प्रियतम के बिछड़ने का दर्द
वेदनाओं को कलमबद्ध करने का दर्द
संवेदनाओं को महसूस करने का दर्द
देश के लिए मर मिटने का दर्द
धर्म और न्याय पर अत्याचार का दर्द
ज्यादा होने का दर्द
लाचारी और अभाव का दर्द
बेबसी में जिंदगी गुजारने का दर्द
दर्द में डूबे रहना ही तो
हमारी नियति है
जो ना डूबे इस दर्द में
उसे क्या मालूम
कि इस दर्द का नशा
कैसा होता है,
क्योंकि यह दर्द तो रंगहीन है ।
गोपाल प्रसाद
बिन ब्याही बेटी के माँ का दर्द
नशे में धुत पति के व्यवहार का दर्द
शराबी बेटे के हरकतों का दर्द
अपनी संपत्ति खो जाने का दर्द
बीमारी से उत्पन्न कष्ट का दर्द
प्रसव वेदना से तड़पती माँ का दर्द
अपनों के खो जाने का दर्द
प्रियतम के बिछड़ने का दर्द
वेदनाओं को कलमबद्ध करने का दर्द
संवेदनाओं को महसूस करने का दर्द
देश के लिए मर मिटने का दर्द
धर्म और न्याय पर अत्याचार का दर्द
ज्यादा होने का दर्द
लाचारी और अभाव का दर्द
बेबसी में जिंदगी गुजारने का दर्द
दर्द में डूबे रहना ही तो
हमारी नियति है
जो ना डूबे इस दर्द में
उसे क्या मालूम
कि इस दर्द का नशा
कैसा होता है,
क्योंकि यह दर्द तो रंगहीन है ।
गोपाल प्रसाद
राजनीति
राजनीति में ईमानदारी
और ईमानदारी की राजनीति,
राजनीति का अपराधीकरण
और अपराधियों का राजनीतिकरण
जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर
हो रहें अब चर्चे
क्योंकि ईमानदारी, सत्य और अहिंसा
शब्द तो अब
अप्रासंगिक हो चुके हैं
कौन करता है चर्चा इस पर
किसके पास है
बेफिजूल वक्त
इतने वक्त में तो
एक राजनीतिज्ञ करोड़पति बन जाएगी
इस देश की गाढी कमाई को
स्विस बैंक में जमा कर
हम देखते रह जाऐंगे
केवल चर्चा कर जाऐंगे
क्या कुछ हो सकता है
इन चर्चाओं से
क्या परिवर्त्तन की धारा बहेगी
इन फिजाओं से
ईमानदार युवाओं के हाथ में होगी
तभी दूर होगी देश की तमाम विकृति ।
- गोपाल प्रसाद
और ईमानदारी की राजनीति,
राजनीति का अपराधीकरण
और अपराधियों का राजनीतिकरण
जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर
हो रहें अब चर्चे
क्योंकि ईमानदारी, सत्य और अहिंसा
शब्द तो अब
अप्रासंगिक हो चुके हैं
कौन करता है चर्चा इस पर
किसके पास है
बेफिजूल वक्त
इतने वक्त में तो
एक राजनीतिज्ञ करोड़पति बन जाएगी
इस देश की गाढी कमाई को
स्विस बैंक में जमा कर
हम देखते रह जाऐंगे
केवल चर्चा कर जाऐंगे
क्या कुछ हो सकता है
इन चर्चाओं से
क्या परिवर्त्तन की धारा बहेगी
इन फिजाओं से
ईमानदार युवाओं के हाथ में होगी
तभी दूर होगी देश की तमाम विकृति ।
- गोपाल प्रसाद
प्रयास
बता सकता है कोई
प्रकृति को बचाने हेतु
किए हैं अपने कितने प्रयास
क्या-क्या किया है आपने
आपने क्या-क्या नहीं किया
धरती को यूरिया से भरकर बंजर बना दिया
चट्टानों को तोड़कर कंकड और रास्ते बना लिए
मगर किसको फिक्र है पूछने की
पहाड़ों की संवेदना
उसे भी हुआ होगा दर्द
झेली होगी त्रादसी
पर्यटन के बहाने हमने उसको गंदा किया
प्रदूषित तन और मन से
सीधे-साधे पहाड़ियों को भी
विकृत कर दिया
हाय रे कमबख्त इंसान
कुछ तो शर्म करो
ये धरा, ये क्षितिज, ये इन्द्रधनुष
ये प्रकृति सब खत्म हो जाएगी
यदि तुम आज भी खुद को चेतो नहीं
विकल्पों को ढूँढो
सावधानियों को बरतो
इन्हें मूक और निर्जीव मत समझो
ये तो काफी अच्छे हैं
तुम्हारे जैसे सजीव से
जो खुद अपनी धरती माँ के
सीने पर खंजर चला रहे हैं
प्रकृति के साथ-अन्याय कर
पर्यावरण प्रदूषण फैला रहे हैं ।
- गोपाल प्रसाद
प्रकृति को बचाने हेतु
किए हैं अपने कितने प्रयास
क्या-क्या किया है आपने
आपने क्या-क्या नहीं किया
धरती को यूरिया से भरकर बंजर बना दिया
चट्टानों को तोड़कर कंकड और रास्ते बना लिए
मगर किसको फिक्र है पूछने की
पहाड़ों की संवेदना
उसे भी हुआ होगा दर्द
झेली होगी त्रादसी
पर्यटन के बहाने हमने उसको गंदा किया
प्रदूषित तन और मन से
सीधे-साधे पहाड़ियों को भी
विकृत कर दिया
हाय रे कमबख्त इंसान
कुछ तो शर्म करो
ये धरा, ये क्षितिज, ये इन्द्रधनुष
ये प्रकृति सब खत्म हो जाएगी
यदि तुम आज भी खुद को चेतो नहीं
विकल्पों को ढूँढो
सावधानियों को बरतो
इन्हें मूक और निर्जीव मत समझो
ये तो काफी अच्छे हैं
तुम्हारे जैसे सजीव से
जो खुद अपनी धरती माँ के
सीने पर खंजर चला रहे हैं
प्रकृति के साथ-अन्याय कर
पर्यावरण प्रदूषण फैला रहे हैं ।
- गोपाल प्रसाद
पहचान
नीलेकणी ने कहा कि हम अपनी पहचान खो रहे हैं
क्या अर्थ है, क्या भावार्थ है इस वाक्य का
सोच रहा हूँ, विचार कर रहा हूँ
क्या हम वास्तव में अपनी पहचान खो गए हैं
हमारे मूल्य, हमारी संस्कृति खो ही तो गई है
हम अपने पराए, रिश्तों-नातों
और संवेदनाओं को भूलते जा रहे हैं ।
अंधे व्यक्ति की तरह बढ़े जा रहे हैं
बिना उद्देश्य, बिना मंजिल के
क्य कभी पहुँच पाऐंगे
जिसका हमने सपना देखा है ।
वही २०२० के सपनों का भारत
क्या किसी जादू से पूरा होगा?
पूरा होगा तो मात्र हमारी पहचान पर
हमारी एकता और अखंडता की शक्ति पर
हमारे सभ्यता और संस्कृति के बल पर
हमारे पूवर्जों, ऋषि मुनियों और बलिदानियों के त्याग पर
आज हम झूठी पहचान के बदौलत जीना चाहते हैं ।
अपने कर्त्तव्य का निर्वहन किए बिना
अधिकार की बात करते हैं
क्या यह न्याय है?
इसका सही जवाब
मिलेगा हमें खुद से, हमे खुद से ।
- गोपाल प्रसाद
क्या अर्थ है, क्या भावार्थ है इस वाक्य का
सोच रहा हूँ, विचार कर रहा हूँ
क्या हम वास्तव में अपनी पहचान खो गए हैं
हमारे मूल्य, हमारी संस्कृति खो ही तो गई है
हम अपने पराए, रिश्तों-नातों
और संवेदनाओं को भूलते जा रहे हैं ।
अंधे व्यक्ति की तरह बढ़े जा रहे हैं
बिना उद्देश्य, बिना मंजिल के
क्य कभी पहुँच पाऐंगे
जिसका हमने सपना देखा है ।
वही २०२० के सपनों का भारत
क्या किसी जादू से पूरा होगा?
पूरा होगा तो मात्र हमारी पहचान पर
हमारी एकता और अखंडता की शक्ति पर
हमारे सभ्यता और संस्कृति के बल पर
हमारे पूवर्जों, ऋषि मुनियों और बलिदानियों के त्याग पर
आज हम झूठी पहचान के बदौलत जीना चाहते हैं ।
अपने कर्त्तव्य का निर्वहन किए बिना
अधिकार की बात करते हैं
क्या यह न्याय है?
इसका सही जवाब
मिलेगा हमें खुद से, हमे खुद से ।
- गोपाल प्रसाद
परंपरा
क्या है हमारी परंपरा
नहीं मालूम हमारे बच्चों को
न हमें गरज है नैतिक शिक्षा और संस्कार बताने की
परंपरा से आगे होने के चक्कर में
हम छोड़ देते हैं अपने पुराने परंपरा को
चौतरफे षडयंत्र की माफिक हो रहे हैं हमले
हमारी संस्कृति और परंपरा पर
स्वच्छंद और उन्मुक्त हो रहे हैं हम
हमें ज्ञान ही नहीं अपनी परंअपरा का
वे कर रहे नए ईजाद इस पर
और हमें दूर करने की ताना बाना है बुन रहे
पाश्चात्य संस्कृति की आँधी
क्या हमें उडा देगी
नहीं कमजोर हम इतने
यहा आँधी हमें क्या डराएगी?
करनी होगी कुछ तैयारी
खींचना होगा एक एक बड़ा दायरा
उस पाश्चात्य संस्कृति के वृत के ऊपर
हम अपनी संस्कृति के बड़े वृत के द्वारा
ही तो कर पाऐंगे उसकी शक्ति को निस्तेज ।
- गोपाल प्रसाद
नहीं मालूम हमारे बच्चों को
न हमें गरज है नैतिक शिक्षा और संस्कार बताने की
परंपरा से आगे होने के चक्कर में
हम छोड़ देते हैं अपने पुराने परंपरा को
चौतरफे षडयंत्र की माफिक हो रहे हैं हमले
हमारी संस्कृति और परंपरा पर
स्वच्छंद और उन्मुक्त हो रहे हैं हम
हमें ज्ञान ही नहीं अपनी परंअपरा का
वे कर रहे नए ईजाद इस पर
और हमें दूर करने की ताना बाना है बुन रहे
पाश्चात्य संस्कृति की आँधी
क्या हमें उडा देगी
नहीं कमजोर हम इतने
यहा आँधी हमें क्या डराएगी?
करनी होगी कुछ तैयारी
खींचना होगा एक एक बड़ा दायरा
उस पाश्चात्य संस्कृति के वृत के ऊपर
हम अपनी संस्कृति के बड़े वृत के द्वारा
ही तो कर पाऐंगे उसकी शक्ति को निस्तेज ।
- गोपाल प्रसाद
नजर
घूरती रहती है नजर
वासना भरी गंधों से युक्त
पूछे कोई उस मासूम अंधखिली
नवयौवना से
जो घूरने वाली हर नजर को
भाँप लेती है
सूँघकर बता सकती है
घूरने वालों के अंदर की बात
क्या यह नजर का दोष है,
या उस नजर से देखनेवालों का
या समाज के चारित्रिक पतन का
पूछना है प्रश्न मुझे
अपने समाज से
दे सकता है कोई भी
इसका जवाब
ढूँढ रहा हूँ उस नजर को
जो इस नजरिए से मुक्त हो
बढ़ गई है बलात्कार और
अवयस्क गर्भ के मामले
हाय रे समाज
हाय यहाँ की स्थितियाँ परिस्थितियाँ
कब खत्म होगी ये
यही सोंचते-सोंचते फिर
एक नए सुबह की दस्तक देने
सूरज निकल आया है ।
- गोपाल प्रसाद
वासना भरी गंधों से युक्त
पूछे कोई उस मासूम अंधखिली
नवयौवना से
जो घूरने वाली हर नजर को
भाँप लेती है
सूँघकर बता सकती है
घूरने वालों के अंदर की बात
क्या यह नजर का दोष है,
या उस नजर से देखनेवालों का
या समाज के चारित्रिक पतन का
पूछना है प्रश्न मुझे
अपने समाज से
दे सकता है कोई भी
इसका जवाब
ढूँढ रहा हूँ उस नजर को
जो इस नजरिए से मुक्त हो
बढ़ गई है बलात्कार और
अवयस्क गर्भ के मामले
हाय रे समाज
हाय यहाँ की स्थितियाँ परिस्थितियाँ
कब खत्म होगी ये
यही सोंचते-सोंचते फिर
एक नए सुबह की दस्तक देने
सूरज निकल आया है ।
- गोपाल प्रसाद
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