सोमवार, 20 सितंबर 2010

अँधेरा रोज मिलता है


कहाँ मैं ढूँढने जाऊँ अँधेरा रोज मिलता है
सुबह की पालकी लेकर सवेरा रोज मिलता है

उड़ा आकाश का पंछी बहुत ही दूर जायेगा
मुसाफिर है मुसाफिर को बसेरा रोज मिलता है

हमें हैं देखते वो भी हमारी नजर है उन पर
नजर में जो रहा बसता चितेरा रोज मिलता है

नहीं चौकस पहरूये जब रहें चौकस कहां तक हम
यहाँ हर मोड़ पर चौकस लुटेरा रोज मिलता है

उन्हें अपनी पड़ी केवल नहीं चिन्ता गरीबों की
झँपोली में लिये नागिन सपेरा रोज मिलता है

सुलाता है चुभन को वो दिहाड़ी रोज ले लेकर
तलाशी में गुजारे की पथेरा रोज मिलता है

सोमवार, 26 अक्तूबर 2009

फिर शेष क्या

नौजवानों देश का उद्धार करना है तुम्हें

दनदनाती चल रही है गोलियाँ
हर नगर में ज़ालिमों की टोलियाँ
जल गया ये देश तो फिर शेष क्या !

जालिमों का वक्‍त पर संहार करना है तुम्हें
नौजवानों देश का उद्धार करना है तुम्हें

प्रेममय, अपनत्व अब फूले फले
साधना का दीप निश दिन ही जले
आदमी को आदमी से प्यार हो

आदमियत का पुनः श्रृंगार करना है तुम्हें
नौजवानों देश का उद्धार करना है तुम्हें

गीत वह जो प्रेम का संदेश दें
कल्पनाओं को नया परिवेश दें
प्रेम की झंकार गूँजे देश में

सत्य का, उत्थान का आधार करना है तुम्हे
नौजवानों देश का उद्धार करना है तुम्हें

- जयसिंह आर्य ‘जय’

निर्धन

जीना दूभर निर्धन का
मरना दुष्कर निर्धन का

पीना क्या खाना इसका
हँसना क्या गाना इसका
ऊषा औ’ संध्या जैसा
आना क्या जाना इसका
क्या है सुखकर निर्धन का
जीना दूभर निर्धन का

इसकी मेहनत पर तो
औरों के बनते घर तो
करता अपराध कोई
दोष आये इसके सर तो
कैसा ईश्‍वर निर्धन का
जीना दूभर निर्धन का

किस्मत क्या इसकी पलटे
भूखे हैं इसके बच्चे
भूख, प्यास की ज्वाला दहके
आँखों में सागर छलके
कहाँ है कविवर निर्धन का
जीना दूभर निर्धन का

- जयसिंह आर्य ‘जय’

स्लमडॉग

अपने धंधे चमकाने हेतु
गरीबों का नया नाम दिया स्लमडॉग
झुग्गियों में रहनेवाले कुत्ते
उनकी स्थिति दिखाकर हो गए मालामाल
बन गए समाचारपत्र के हेडलाईन
लाना था चर्चा में स्लमडॉग को इसीलिए
विदेशियों के पुरस्कार और सम्मान की हुई चर्चा पर चर्चा
खुश हो गए हम विदेशी पुरस्कार पाकर
मस्त हो गए हम अपनी गरीबी पाकर
उनकी आदत है गरीबी को पुरस्कृत करना
हमारी आदत है गरीबी में तृप्त रहना
क्या खत्म हो सकेगी गरीबी?
गरीबी तो गरीबों के साथ खत्म होगी
खत्म होगी लाचारी और बेबसी
ये अलग बात है तब दुनियाँ नहीं होगी
क्योंकि युद्ध के बाद दुनियाँ बचेगी कहाँ
मैंने पढा था जब-जब संवेदनशीलता खत्म होगी
तब-तब होगा एक नया युद्ध......

गोपाल प्रसाद

ये लड़कियाँ

खुद इस्तेमाल हो रही ये लड़कियाँ,
पश्‍चिमी सभ्यता के मोहपाश में,
जकड़ी जा रही हैं ये लड़कियाँ,
नहाने के साबुन से कंडोम के विज्ञापन तक में ,
अपना जिस्म दिखा रही हैं ये लड़कियाँ,
कभी फैशन शो में, कभी चीयर गर्ल बनकर,
जलवे दिखा रही हैं ये लड़कियाँ,
जिस्म को ढकने के बजाय जिसने,
दिखाने की वस्तु बना दिया,
खुद बदनाम हो गई हैं ये लड़कियाँ,
क्या उम्मीद करूँ बनेगी कोई लक्ष्मीबाई,
जन्म लेगी अब कोई सीतामाई,
जब संस्कृति और संस्कार को नहीं जानेगी,
हम क्या थे, क्या हैं और क्या होंगे,
जब तक जानेंगी नहीं ये लड़कियाँ,
गिरती चली जाएँगी, पतन होता जाएगा,
आपको लगता है सम्मान दिलाएँगी ये लड़कियाँ?
इनको सुधारने क्या कोई नया जन्म लेगी?
अब भी वक्‍त है सुधर जाओ संभल जाओ,
गुजरे जमाने का आदर्श छोड़ रही हैं ये लड़कियाँ,
तलाक, हत्या और बलात्कार की शिकार ये हो रहीं,
जिंदा जलाए जाने की खबर बन रही ये लड़कियाँ,
कहाँ गई वो शर्म, हया, वो त्याग , वो भावना,
कभी आदर्श हुआ करती थीं ये लड़कियाँ,
शायरों, कवियों, ग़जलकारों की विषय जो हुआ करती थीं,
डॉक्टरों के यहाँ गर्भपात करा रही यें लड़कियाँ,
आजादी का गलत अर्थ जब-जब निकालेंगे,
बद नहीं बल्कि बदतर हो जाएँगी ये लड़कियाँ,
चाहे हो हिंदू, मुसलमान, सिख, या इसाई,
कभी न कभी होंगी परायी ये लड़कियाँ,
सास-ससुर, ननद और देवर-जेठ के नखरे,
शिक्षा दो इनको कैसे भार उठाएँगी ये लड़कियाँ,
नारी के नारीत्व को जब ये अपनाएँ,
खुद की ही नहीं, समाज की भी पहचान बनेंगी ये लड़कियाँ ।

गोपाल प्रसाद

सोमवार, 19 अक्तूबर 2009

“मत गर्दिशी की बात कर”

गर्दिशों में जी रहा मैं,
मत गर्दिशी की बात कर ।
हो सके यदि कर सको तो,
प्यार की कुछ बात कर ॥




शून्य सा अब मैं खड़ा हूँ,
बस अभां की रात है ।
स्वप्न में ही देखता हूँ,
चाँदनी भी साथ है ॥




इक दिया बनकर प्रिये तू,
कुछ रोशनी इजहार कर ।
गर्दिशों में जी रहा मैं,
मत गर्दिशी की बात कर ।
हो सके यदि कर सको तो,
प्यार ................. ॥




इम्तहाने वक्‍त ने बस वक्‍त की पहचान दी।
लग रहे तो जो पराए जिन्दगी की राह दी ॥




होकर पराया ही सही हूँ,
हम सफर बन प्यार कर ।
गर्दिशों में जी रहा मैं,
मत गर्दिशी की बात कर ।
हो सके यदि कर सको तो
प्यार की ............. ॥





‘ढूँढता था मैं जहाँ में,
बस एक रहनुमा की चाह थी ।
होश जब मुझको हुआ,
मानो उम्र ही गुजार दी ॥




सोच ऐसी ना रही अब, तूँ वफा या बेवफा,
बेवफा होकर सही तूँ कुछ वफा की बात कर ।
गर्दिशों में जी रहा मैं, मत गर्दिशी की बात कर,
हो सके यदि कर सको, प्यार.....................॥





कह रहा मुझसे चमन,
तोड़कर अब अपना मौन ।
जख्म अपने देख ले तूँ,
कुछ मरहमें इजाद कर ॥




साथ जिनका पा लिया है, बस उन्हीं से प्यार कर,
गर्दिशों में जी रहा मैं मत गर्दिशी की बातकर ।
हो सके यदि कर सको तो, प्यार.....................॥





प्यार के इस राह पर,
सहादतें हजार हैं ।
मान ले तूँ जिन्दगी,
एक फासले गुबार है ॥




इस निशा की कालिमा में, तूँ चाँद बन जहान पर ।
मत गवाँ इस वक्‍त को आ जिगर से प्यार कर,
गर्दिशों में जी रहा मैं, मत गर्दिशी की बात कर ।
हो सके यदि कर सको तो, प्यार की कुछ बात कर ॥

शनिवार, 5 सितंबर 2009

भोजपुरी गीत

“पिया कासे कहूँ मन पीर”
सुखाई गयो नयना के नीर,
पिया कासे कहूँ मन की पीर ।
घरवा बसाई पिया ग‍इले विदेशवाँ,
चिट्ठियाँ न भेजला, न भेजला सनेशवाँ ।
रूपिया सवतिया से नेहिया लगवला,
कवने करन पिया हमें बिसरावला ॥
अब तो घरवा (अँगना) लगे जंजीर
होपिया कासे कहूँ मन की पीर हो ।’
सुखाई गयो---------------------------
अब तो पिया अंग्रेज होई ग‍इला,
गऊवाँ देहतवा से दूर होई ग‍इला ।
आपन सुरतिया सपन कई दिहला,
एहि रे अभागिन क नीदिया चोरवला ॥
मति मारा करेजवाँ मे तीर हो
पिया कासे कहूँ मन की पीर हो ।
सुखाई गयो नयना-------
क‍इसे तूँ बाट पिया इह बतावा,
हो सके तो हमरा के तनि समझावा ।
बेकल इ मन के रहिया देखावा,
अपने चरनवाँ क दासी बनावा ।
पिता तूँ हमर तकदीर हो,
पिया कासे कहूँ मन की पीर हो ।
सुखाई गयो नयना --------
“इहवाँ क मटियाँ तूँ कहबो न भूल‍इयाँ,
गंगा के पनियाँ तूँ माथे चढ़ाईयाँ ।
माई की मूरतियाँ तूँ सीना से लगईयाँ,
देशवा के खातिर तूँ सब कुछ लूटईयाँ ॥
पिया होई ज‍इबा भारत क वीर हो,
पिया कासे कहूँ मन की पीर हो ।
सुखाई गयो नयना -------------------

पं. कृष्ण मुरारी मिश्रा