बुधवार, 22 जुलाई 2009

भारत माता

मैंने पूछा भारत माँ से एक प्रश्न,
रूढियाँ, अंधविश्‍वास, प्रथाएँ और परंपरा,
पूर्व से ही तो थे यहाँ पर,
फिर भी इतना भेद न था,
जो आज आरक्षण समर्थन -विरोध,
के कारण समाज के टुकड़ों में,
बँटने से हो चुका है,
साम्प्रदायिकता, आतंकवाद,आज भवें चढ़ा रहा है ,
संस्कृति का हो रहा पतन,
भ्रष्टाचार, बेईमानी बल खा रहा है,
बढ़ गई है हमारी अंतहीन चिंताएँ,
हो सकती है ये चिंताएँ,
ही सजाएँगी हमारी चिताएँ,
माँ अपने पुत्रों की स्थिति,
पर कुछ तो सोचो,
कुछ तो बोलो मुँह तो खोलो,
मैंने सुना है माँ का सीना विशाल होता है,
पुत्र देता है माँ को दगा मगर,
पुत्र को चोट लगने पर,
माँ को ही दर्द का एहसास होता है ।
- गोपाल प्रसाद

1 टिप्पणी:

  1. Bhai Gopalji!
    Is kavita aur samay darpan ke liye mai aapki pratibha ko naman karta hun!
    aaiya ham sabhi BharatMata ki santane uske charitravan bacche bane.Bharat tabhi mahan hoga jab iske log mahan aur charitravan manushya honge.isiliye Svami Vikananda ne Bharat nirman ka sutra diya tha-"Be & Make"!pahle ham svyam manushy bane aur dusaron ko manushya ban ne me sahayta karen.
    Akhil Bharat Vivekananda Yuva Mahamandal isi 'yuva charitra nirman' ke kary ko chupchap 1967 se kar raha hai.aasha hai apke blog aur 'samay darpan'patrika is charitra nirman andolan ko hindi kshetra me aur aage le jane me sahayak siddh hogi.

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