गुरुवार, 23 जुलाई 2009

समीक्षा का दर्द

बीत गए वर्ष दो उन्हें दिए हुए पुस्तक
जाने क्यों मौन हैं वो अभी तक समीक्षक
कितनी टीस देती है ये पुस्तक समीक्षा
कैसे ले रहे हैं ये कवि की परीक्षा
दंभ से भरे हुए ये महोदय समीक्ष
नई पौध के हैं ये रक्षक या कि भक्षक
धारा, विद्या विषय नहीं है इन्हें सरोकार
ऐसे समीक्षकों को है बार-बार धिक्‍कार ।

- गोपाल प्रसाद

10 टिप्‍पणियां:

  1. galat vyakti ke paas rachanaaye kyo^ bhej rahe hai dambhee sameexaka aapakee rachanaao ko kyaa khaak samajhegaa

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  2. bahut hi khoobsurat vyangya or samiksho par kataksh hai...

    bhai hamari taraf se to pure pure marks milte hain aapko...

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  3. चिटठा जगत में आपका स्वागत है.
    ---
    उम्मीद करते हैं कि आप अपनी कलम से अपना नाम ही नहीं हमारे समाज और देश के कई अनगिनत पहलुओं को भी कमा ले जाएंगे. शुक्रिया. जारी रहिये.
    --
    देश भक्ति के भावः को दीजिये शब्द "एक चिट्ठी देश के नाम लिखकर" कहिये देश को अपनी बात- विजिट करें- [उल्टा तीर] http://ultateer.blogspot.com
    ---
    अमित के सागर

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  4. Shubh kamnaon sahit swagat hai!

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